हिन्दू धर्म के पुराणों के अनुसार शिव भगवान प्रकृति के कल्याण हेतु भारतवर्ष में 12 जगहों पर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए, उन 12 जगहों पर उपस्थित शिवलिंगों को ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजा जाता है, जिनमें से 1 ज्योतिर्लिंग केदारनाथ भी है। यह 4 धाम एवम पंच केदारों में 1 है। पंच केदारों में केदारनाथ, रुद्रनाथ, कल्पेश्वर, मध्येश्वर एवम तुंगनाथ शामिल हैं। केदारनाथ मंदिर भारत के उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है।

आपको बता दें कि केदारनाथ धाम के कपाट श्रद्धालुओं के लिए 6 माह के लिए खुलते हैं, और बाद में सर्दियों में भारी बर्फबारी के चलते वहां पहुंचने का रास्ता बंद हो जाता है। केदारनाथ धाम में हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। इस धाम के प्रति लोगों की अटूट श्रद्धा और विश्वास है। केदारनाथ धाम मंदिर तीनों तरफ से पहाड़ों से घिरा है। एक तरफ 22000 फुट ऊंचा केदारनाथ पर्वत है, तो दूसरी तरफ 21600 फुट ऊंचा ख़र्चकुंड। और तीसरी तरफ है 22000 फुट ऊंचा भरतकुंड। न सिर्फ तीन पर्वत बल्कि 5 नदियों का संगम भी यहां पर माना जाता है। जिनमें मंदाकिनी, मधुगंगा, चीरगंगा, सरस्वती और स्वर्णगौरी शामिल हैं। इन नदियों में से कुछ को काल्पनिक माना जाता है। इनमें से मन्दाकिनी ही साफ तौर पर दिखाई देती है। केदारनाथ मंदिर के निर्माण को लेकर कई बातें कही गयी हैं, इसे 1000 वर्ष से भी पुराना माना जाता है। यह भी कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण पांडवों के वंशज जन्मजय द्वारा करवाया गया था। एक प्रचलित मान्यता के अनुसार मंदिर का निर्माण जगत गुरु आदि शंकराचार्य ने 8 वीं शताब्दी में करवाया था। मंदिर के पुछले भाग में जगत गुरु आदि शंकराचार्य की समाधि भी है।

केदारनाथ मंदिर को लेकर 2 कथाएं प्रसिद्ध हैं, पहली कहानी के अनुसार केदार के शिखर पर भगवान विष्णु के अवतार नर और नारायण ऋषि यहां पर तपस्या करते थे, उनकी अराधना से खुश होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और उनकी प्रार्थना के अनुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में वहीं पर सदा वास करने का वचन दिया।

दूसरी कहानी के अनुसार माना जाता है कि महाभारत के युद्ध को जीतने के बाद पांडवों को परिवार के सदस्यों की हत्या का पाप लगा था। जिसके बाद पांडव इस पाप से मुक्त होना चाहते थे। और भगवान शिव का आशीर्वाद पाना चाहते थे। भगवान शिव पांडवों के इस पाप से नाराज़ थे। पांडव भगवान शिव के दर्शन के लिए काशी भी गये थे, लेकिन भगवान शिव उन्हें नहीं मिले। पांडव भगवान को ढूंढते – ढूंढते हिमालय तक आ पहुंचे। भगवान शिव पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे। इसलिए वे वहां से अंतरध्यान हुए और केदार जा बसे। दूसरी तरफ पांडव भी अपनी लगन के पक्के थे और भगवान का पीछा करते करते वे भी केदार आ पहुंचे। भगवान शिव ने तब बैल का रूप धारण किया और पशुओं के झुंड में जाकर मिल गए। पांडवों को इस बात का संदेह हो गया था। तभी भीम ने अपना विशालतम रूप धारण किया और दोनों पहाड़ों पर अपबे पैर फैला दिए, यह सब देखकर, सभी गाय बैल तो भीम के पैर के नीचे से निकल गए, लेकिन शंकर जी वहीं रह गए। भगवान शंकर पांडवों की भक्ति और दृढ़ संकल्प को देखकर बहुत खुश हुए। उन्होंने उसी समय दर्शन देकर पांडवों को पाप से मुक्त कर दिया। उसी समय से शंकर जी की बैल के रूप की आकृति केदारनाथ धाम में पूजी जाती है।

केदारनाथ मंदिर 85 फ़ीट ऊंचा ओर 187 फ़ीट चोड़ा है। इसकी दीवारें 12 फ़ीट मोटी हैं और बेहद मज़बूत पत्थरों से बनाई गई हैं।

केदारनाथ पहुंचने के लिए रुद्रप्रयाग से गुप्तकाशी से होकर 20 किलोमीटर आगे गौरेकुंड तक का सफर तय करना पड़ता है।

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